हरिद्वार, चंद्रप्रकाश बहुगुणा
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति एवं प्रख्यात शिक्षाविद् डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि नदियां भारतीय संस्कृति की जीवनरेखा हैं और जल संरक्षण केवल पर्यावरणीय जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारा सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक कर्तव्य भी है।
वे हिंडन नदी के संरक्षण, संवर्धन एवं जन-जागरूकता के उद्देश्य से आयोजित हिंडन नदी शोध यात्रा के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में पर्यावरणविदों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं जागरूक नागरिकों की उल्लेखनीय सहभागिता रही, जिससे यह एक व्यापक जनअभियान का स्वरूप लेता नजर आया।
अपने प्रेरणादायक संबोधन में अखिल विश्व गायत्री परिवार के युवा प्रतिनिधि डॉ. पण्ड्या ने कहा कि वर्तमान समय मानवता के लिए एक निर्णायक दौर है। उन्होंने बताया कि जिन पंचमहाभूतों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—से हमारा अस्तित्व निर्मित हुआ है, आज मानव स्वयं उनकी शुद्धता को नष्ट करने में लगा है। इस बढ़ते पर्यावरणीय संकट का मूल कारण मानव का स्वार्थ है, जिसने प्रकृति के साथ हमारे संतुलन को कमजोर कर दिया है।
उन्होंने समाज के प्रत्येक वर्ग से आह्वान किया कि वे अपने भीतर उत्तरदायित्व, संवेदनशीलता और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का भाव विकसित करें। जब तक जल और पर्यावरण को केवल संसाधन के रूप में देखा जाएगा, तब तक संरक्षण के प्रयास अधूरे रहेंगे। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि हम जल को अपनी संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का अभिन्न हिस्सा मानें।
इस अवसर पर डॉ. पण्ड्या ने मंचासीन अतिथियों को देव संस्कृति विश्वविद्यालय एवं शांतिकुंज के प्रतीक चिह्न भेंट कर सम्मानित किया।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी लोगों ने नदियों के पुनर्जीवन एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए सक्रिय भागीदारी का संकल्प लिया। सभी ने एक स्वर में इसे केवल एक कार्यक्रम का समापन नहीं, बल्कि एक सतत जनसंकल्प की शुरुआत बताया।
इस दौरान मनु गौड़, रमन कांत, शिप्रा शुक्ला, सुश्री इशिका तनेजा सहित कई वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में भारतीय नदी परिषद के अधिकारीगण एवं गायत्री परिवार के अनेक सदस्य उपस्थित रहे।



